March 8, 2021

WAY OF SKY

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हिन्दी व्याकरण

1) व्याकरण वह विद्या या कला है जिसके द्वारा किसी भाषा को शुद्ध रूप से बोलना या लिखना होता है
2) व्याकरण एक शास्त्र है जिसमें भाषा को शुद्ध करने वाले नियम बताए जाते है, जिसमें भाषा के शुद्ध रूप में लिखने , बोलने , पढने के नियम होते है

किसी भी भाषा के व्याकरण के लिए तीन मूल तत्व होते है

  • वर्ण या अक्षर
  • शब्द
  • वाक्य

1. वर्ण या अक्षर

किसी भी भाषा की सबसे छोटी व मूल इकाई जिसके और छोटे टुकड़े नहीं किये जा सकते, वर्ण कहलाते, है यह एक प्रकार की ध्वनि होती है
हिंदी में 44 प्रकार के वर्ण है, जिन्हे दो भागों में बांटा गया है
1) स्वर
2) व्यंजन

स्वर

ऐसी ध्वनि जिसके उच्चारण में किसी अन्य ध्वनि की आवश्यकता नहीं पड़ती, स्वर कहलाते है |
स्वर 11 होते है: अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ
इन्हे भी दो भागों में बांटा जा सकता है, ह्रस्व व दीर्घ

जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगे ह्रस्व स्वर कहलाते है| जैसे : अ,इ,उ |

जिन स्वरों को बोलने में अधिक समय लगे उन्हें दीर्घ स्वर कहते है | इन्हे मात्र द्वारा भी दर्शाया जाता है ये दो स्वरों की मिला कर बनाये जाते है इसलिए इन्हे सयुंक्त स्वर भी कहते है |
आ,ई,ऊ,ए,ऐ,ओ,औ,ऋ

इसके अलावा हिन्दी और संस्कृत में ये वर्णाक्षर भी स्वर माने जाते हैं :

ऋ — इसका उच्चारण रि और रु के बीच का होगा, परंतु आधुनिक हिंदी में इसका उच्चारण “रि” की तरह किया जाता है ।
अं — पंचम वर्ण – ङ्, ञ्, ण्, न्, म् का नासिकीकरण करने के लिए (अनुस्वार)
अँ — स्वर का अनुनासिकीकरण करने के लिए (चन्द्रबिन्दु)
अः — अघोष “ह्” (निःश्वास) के लिए (विसर्ग)
‘अं’ और ‘अः’ को स्वर में नहीं गिना जाता है। इन्हें अयोगवाह ध्वनियाँ कहते हैं

व्यंजन

वह ध्वनियाँ जो स्वरों की सहायता से बोली जाती है, उन्हें व्यंजन कहते है | जब हम क बोलते है तो उसमे क् + अ का मिश्रण होता है
जब किसी स्वर प्रयोग नहीं हो, तो वहाँ पर ‘अ’ माना जाता है। स्वर के न होने को हलन्त्‌ अथवा विराम से दर्शाया जाता है। जैसे क्‌ ख्‌ ग्‌ घ्‌।
हिंदी में व्यंजनों की संख्या 33 होती है|

व्यंजन के प्रकार

व्यंजन तीन प्रकार के होते है-
(1)स्पर्श व्यंजन(Mutes)
(2)अन्तःस्थ व्यंजन(Semivowels)
(3)उष्म या संघर्षी व्यंजन(Sibilants)

(1)स्पर्श व्यंजन(Mutes) :- स्पर्श का अर्थ होता है -छूना। जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय जीभ मुँह के किसी भाग जैसे- कण्ठ, तालु, मूर्धा, दाँत, अथवा होठ का स्पर्श करती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते है।
स्पर्श व्यंजन को 5 वर्गों में बांटा गया है इस लिए इन्हें वर्गीय व्यंजन भी कहा जाता है,इनकी संख्या 25 होती है|
‘क’वर्ग-क,ख,ग,घ,ड़ (कण्ठ से बोले जाने वाले)
‘च’वर्ग-च,छ,ज,झ,ञ (तालू से बोले जाने वाले)
‘ट’वर्ग-ट,ठ,ड,ढ,ण (मूर्धा से बोले जाने वाले)
‘त’वर्ग-त,थ,द,ध,न (दंत्त से बोले जाने वाले)
‘प’वर्ग-प,फ,ब,भ,म (ओष्ठ से बोले जाने वाले)

(2)अन्तःस्थ व्यंजन(Semivowels) :- ‘अन्तः’ का अर्थ होता है- ‘भीतर’। उच्चारण के समय जो व्यंजन मुँह के भीतर ही रहे उन्हें अन्तःस्थ व्यंजन कहते है।
उच्चारण के समय जिह्वा मुख के किसी भाग को स्पर्श नहीं करती।अतः ये चारों अन्तःस्थ व्यंजन ‘अर्द्धस्वर’ कहलाते हैं।
ये व्यंजन चार होते है- य, र, ल, व।

(3)उष्म या संघर्षी व्यंजन(Sibilants) :- उष्म का अर्थ होता है- गर्म। जिन वर्णो के उच्चारण के समय हवा मुँह के विभिन्न भागों से टकराये और साँस में गर्मी पैदा कर दे, उन्हें उष्म व्यंजन कहते है।
ये भी चार व्यंजन होते है- श, ष, स, ह।

इसके अलावा संयुक्त व्यंजन भी होते है

संयुक्त व्यंजन :-वे व्यंजन जो दो या दो अधिक व्यंजनों से मिल कर बनती है,संयुक्त व्यंजन कहलाते है
जो चार होते है : क्ष , त्र , ज्ञ , श्र

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