October 26, 2021

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समास अर्थ , प्रकार और उदाहरण

समास किसे कहते है ?

समास शब्द का अर्थ- संक्षिप्त या छोटा करना है। दो या दो से अधिक शब्दों  में मेल या संयोग को समास कहते हैं। इस मेल में विभक्ति चिह्नों का लोप हो जाता है।
भाषा में संक्षिप्तता बहुत ही आवश्यक होती है और समास इसमें सहायक होते हैं। समास द्वारा संक्षेप में कम से कम शब्दों द्वारा बडी से बडी और पूर्ण बात कही जाती है।
समास का उद्भव ही समान अर्थ को कम से कम शब्द में करने की प्रवृति के कारण हुआ है।
जैसे- “आना और जाना” में तीन शब्दों के प्रयोग के स्थान पर ’आना-जाना’ एक समस्त शब्द किया जा सकता है।

इस प्रकार दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से विभक्ति चिह्नों के लोप के कारण जो नवीन शब्द बनते हैं उन्हें सामासिक या समस्त पद कहते हैं।
सामासिक शब्दों का संबंध व्यक्त करने वाले विभक्ति चिह्नों आदि के साथ प्रकट करने अथवा लिखने वाली रीति को ’विग्रह’ कहते हैं।
जैसे-’विधालय ’ समस्त पद का विग्रह ’विद्या का आलय ’, ’स्नानघर ’ समस्त पद का विग्रह ’स्नान के लिए घर’
समस्त पद में मुख्यतः दो पद होते हैं-पूर्वपद व उतरपद।
पहलेवाले पद को ’पूर्वपद’ व दूसरे पद को ’उतरपद’ कहते हैं।
समस्द पद        पूर्वपद       उतरपद            समास विग्रह
पूजाघर                पूजा          घर               पूजा के लिए घर
माता-पिता           माता         पिता              माता और पिता
नवरत्न                 नव            रत्न              नौ रत्नों का समूह
हस्तगत               हस्त         गत               हस्त में गया हुआ

समास के भेद

मुख्यतः समास के चार भेद होते हैं। जिन दो शब्दों में समास होता है, उनकी प्रधानता अथवा अप्रधानता के विभागत्व पर ये भेद किए गए हैं।

  • जिस समास में पहला शब्द प्रायः प्रधान होता है, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं;
  • जिस समास में दूसरा शब्द प्रधान रहता है, उसे तत्पुरूष कहते हैं।
  • जिसमें दोनों शब्द प्रधान होते हैं, वह द्वंद्व कहलाता है |
  • और जिसमें कोई भी प्रधान नहीं होता उसे बहुब्रीहि समास कहते हैं।

तत्पुरूष के पुनः दो अतिरिक्त किंतु स्वतंत्र भेद स्वीकार किए गए हैं-कर्मधारय समास एवं द्विगु समास।

1 अव्ययीभाव समास

इस समास में परिवर्तनशीलता का भाव होता है और उस अव्यय पद का रूप लिंग, वचन, कारक में नहीं बदलता वह सदैव एकसा रहता है। इसमें पहला पद प्रधान होता है, जैसे-
समस्त पद                               समास विग्रह
यथाशक्ति                               शक्ति अनुसार
यथासमय                              समय के अनुसार
प्रतिक्षण                                       हर क्षण
यथासंभव                                जैसा संभव हो
आजीवन                                  जीवन भर
भरपेट                                      पेट भरकर
आजन्म                                   जन्म से लेकर
आमरण                                    मरण तक
प्रतिदिन                                     हर दिन
बेखबर                                   बिना खबर के

अपवाद-हिंदी के कई ऐसे समस्त पद जिनमें कोई शब्द अव्यय नहीं होता पंरतु समस्त पद अव्यय की तरह प्रयुक्त होता है, वहांॅ भी अव्ययीभाव समास माना जाता है, जैसे-
घर-घर             घर के बाद घर
रातों-रात          रात ही रात में

2 तत्पुरूष समास

इस समास में पहला पद गौण व दूसरा पद प्रधान होता है
इस समास में पहला पद गौण व दूसरा पद प्रधान होता है। इसमें कारक के विभक्ति चिह्नों का लोप हो जाता है (कर्ता व संबोधन कारक को छोडकर) इसलिए छह कारकों के आधार पर इस समास के भी छः भेद किए गए हैं।

(क) कर्म तत्पुरूष समास (’को’ विभक्ति चिह्नों का लोप)

समस्त पद                     समास विग्रह                                                                                        ग्रामगत                     ग्राम को गया हुआ
पदप्राप्त                      पद को प्राप्त
सर्वप्रिय                       सर्व को प्रिय
यशप्राप्त                     यश को प्राप्त
शरणागत                    शरण को आया हुआ
सर्वप्रिय                         सभी को प्रिय

(ख) करण तत्पुरूष समास (’सेे’ चिह्न का लोप होता है )

भावपूर्ण                         भाव से पूर्ण
बाणाहत                        बाण से आहत
हस्तलिखित                   हस्त से लिखित
बाढपीडित                    बाढ से पीडित

(ग) संप्रदान तत्पुरूष समास (’के लिए’ चिह्नों का लोप )

गुरूदक्षिणा                गुरू के लिए दक्षिणा
राहखर्च                      राह के लिए खर्च
बालामृत                   बालकों के लिए अमृत
युद्धभूमि                    युद्ध के लिए भूमि
विद्यालय                   विद्या के लिए आलय

(घ) अपादान तत्पुरूष समास (’से’ पृथक या अलग के लिए चिह्न का लोप)

देशनिकाला                     देश से निकाला
बंधनमुक्त                        बंधन से मुक्त
पथभ्रष्ट                             पथ से भ्रष्ट
ऋणमुक्त                        ऋण से मुक्त

(ड) संबंध तत्पुरूष कारक (’का’, ’के’, ’की’ चिह्नों का लोप)

गंगाजल                       गंगा का जल
नगरसेठ                     नगर का सेठ
राजमाता                    राजा की माता
जलधारा                     जल की धारा
मतदाता                     मत का दाता

(च) अधिकरण तत्पुरूष समास (’में’, ’पर’ चिह्नों का लोप)

जलमग्न                      जल में मग्न
आपबीती                 आप पर बीती
सिरदर्द                     सिर मेें दर्द
घुडसवार                घोडे पर सवार

3 कर्मधारय समास

इस समास के पहले तथा दूसरे पद में विशेषण, विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध होता है, जैसे-
समस्त पद विशेषण          विशेष्य समास विग्रह
महापुरूष                        महान है जो पुरूष
पीतांबर                           पीला है जो अंबर
प्राणप्रिय                          प्रिय है जो प्राणों को
उपमेय           –               उपमान विग्रह
चंद्रवदन                          चंद्रमा के समान वदन (मुंॅह)
कमलनयन                       कमल के समान नयन
विद्याधन                           विद्या रूपी धन
भवसागर                          भव रूपी सागर
मृगनयनी                          मृग के समान नेत्रवाली

4 द्विगु समास

इस समास का पहला पद संख्यावाचक अर्थात गणना-बोधक होता है तथा दूसरा पद प्रधान होता है क्योंकि इसमें बहुधा यह जाना जाता है कि इतनी वस्तुओं का समूह है, जैसे-
समस्त पद                   समास विग्रह
नवरत्न                      नौ/नव रत्नों का समूह
सप्ताह                     सात अहतों(दिनों) का समूह
त्रिमूर्ति                      तीन मूर्तियों का समूह
शताब्दी                   सौ अब्दों (वर्षों) का समूह
त्रिभुज                     तीन भुजाओं का समूह
नवरात्र                   नव  (नो) रात्रियों का समाहार

अपवाद- कुछ समस्त पदों में शब्द के अंत में संख्यावाचक शब्दांश आता है, जैसे-

पक्षद्वय                दो पक्षों का समूह
लेखकद्वय           दो लेखकों का समूह
संकलनत्रय        तीन संकलनों का समूह

5 द्वन्द्व समास

इस समास में  दोनों पद समान रूप से प्रभाव होते हैं। इसके दोनों पद योजक-चिह्न द्वारा जुडे होते हैं तथा समास-विग्रह करने पर ’और’, ’या’ ’अथवा’ तथा ’एवं’ आदि लगते हैं, जैसे-
समस्त पद              समास विग्रह
रात-दिन                रात और दिन
सीता-राम              सीता और राम
दाल-रोटी              दाल और रोटी
माता-पिता             माता और पिता
आयात-निर्यात        आयात और निर्यात
हानि-लाभ              हानि या लाभ
आना-जाना           आना और जाना

6 बहुब्रीहि समास

जिस समास में पूर्वपद व उतरपद दोनों ही गौण हो और अन्य पद प्रधान हो और उसके षाब्दिक अर्थ को छोडकर एक नया अर्थ निकाला जाता है, वह बहुब्रीहि समास कहलाता है, जैसे-लंबोदर अर्थात लंबा है उदर (पेट) जिसका/दोनों पदों का अर्थ प्रधान न होकर अन्यार्थ ’गणेष’ प्रधान है।
समस्त पद                        समास विग्रह
घनश्याम                    घन जैसा श्याम अर्थात् कृष्ण
नीलकंठ                     नीला कंठ है जिसका अर्थात् षिव
दषानन                      दस आनन हैं जिसके अर्थात् रावण
गजानन                      गज के समान आनन वाला अर्थात् गणेष
त्रिलोचन                    तीन हैं लोचन जिसके अर्थात् शिव
हंसवाहिनी                 हंस है वाहन जिसका अर्थात् सरस्वती
महावीर                     महान है जो वीर अर्थात् हनुमान
दिगंबर                       दिशा  ही है अंबर जिसका अर्थात् शिव
चतुर्भुज                      चार भुजाएंॅ हैं जिसके अर्थात् विष्णु

सामान्यतया : यह देखा जाता है कि कुछ समासों में कुछ विशेषताएंॅ समान पाई जाती हैं लेकिन फिर भी उनमे मौलिक अंतर होता है। समान प्रतीत होनवाले समासों के अंतर को वाक्य में भिन्न प्रयोग के कारण समझाा जा सकता है। कुछ शब्द ों में दो अलग-अलग समासों की विशेषताएंॅ दिखाई पडती हैं।

कर्मधारय और बहुब्रीहि समास में अंतर

कर्मधारय समास में दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य तथा उपमान-उपमेय का संबंध होता हैं लेकिन बहुब्रीहि समास में दोनों पदों का अथ प्रधान न होकर ’अन्यार्थ’ प्रधान होता है।
जैसे-मृगनयन-मृग के समान नयन (कर्मधारय) तथा नीलकंठ=वह जिसका कंठ नीला है-शिव अर्थात ’शिव’ अन्याथ्ज्र्ञ लिया गया है (बहुब्रीहि समास)

बहुब्रीहि व द्विगु समास में अंतर

द्विगु समास में पहला पद संख्यावाचक होता है और समस्त पद समूह का बोध कराता है लेकिन बहुब्रीहि समास में पहला पद संख्यावाचक होने पर भी समस्त पद से समूह का बोध न होकर अन्य अर्थ का बोध कराता है।
जैसे-चैराहा अर्थात चार राहों का समूह (द्विगु समास)
चतुर्भुज-चार हैं भुजाएंॅ जिसके (विष्णु) अत्यार्थ (बहुब्रीहि समास)

संधि और समास में अंतर

संधि में दो वर्णों या ध्वनियों का मेल होता है पहले शब्द की अंतिम ध्वनि और दूसरे शब्द की आरंभिक ध्वनि में परिवर्तन आ जाता है, जैसे-’लंबोदर’ में ’लंबा’ शब्द की अंतिम ध्वनि ’आ’ और ’उदर’ शब्द की आरंभिक ध्वनि ’उ’ में ’आ’ व ’उ’ के मेल से ’ओ’ ध्वनि में परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार संधि में दो या दो से अधिक शब्द ों की कमी न होकर ध्वनियों का मेल होता है किंतु समास में ’लंबोदर’ का अर्थ ’लंबा है उदर जिसका’ शब्द समूह बनता है। अतः समास में मूलतः शब्दों  का योग होता है जिसका उद्देश्य  पद में संक्षिप्तता लाना है।

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