December 1, 2020

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मानव वृद्धि और विकास human growth and Development

मानव वृद्धि और विकास |human growth and Development|

मानव वृद्धि और विकास  (human growth and Development) : परिवर्तन ही संसार का नियम है , चाहें वस्तु सजीव हो या निर्जीव हो उनमे हमेशा कोई ना कोई परिवर्तन होता रहता है |मानव में परिवर्तनों की श्रृंखला ही मानव का वृद्धि और विकास (Growth and Development ) है | विकास प्राणी की वह विशेषता है , जिसका प्रारंभ गर्भधारण से होता है और जीवन पर्यंत चलता है | तो चलिए जानते है की मानव में वृद्धि और विकास ( What is Human growth and development ?) क्या है ?

What is Human growth and development ?

मानव विकास की परिभाषा (Definition of  Human Development) :

गैसल (Gessel) :-  विकास अभिवृद्धि के सम्प्रत्यय की अपेक्षा अधिक व्यापक है | इसका अवलोकन , मुल्यांकन एवं कुछ सीमा तक तीनो रूपों – शरीर –रचनात्मक , शरीर क्रिया विज्ञान विज्ञानात्मक एवं व्यवहारात्मक में मापन किया जा सकता है | व्यवहारात्मक संकेत ही विकास के सर्वाधिक व्यापक परिचायक होते है |

ई .बी .हरलॉक (E.B. Hurlock):- “ विकास अपेक्षाकृत अभिवृद्धि होने तक सीमित नही होता अपितु ऐसे प्रगतिशील परिवर्तनों में निहित है जो परिपक्वता के लक्ष्य की और व्यवस्थित रूप से उन्मुख होते है |”

हर्बट सोरेसन (H. sorenson) : “विकास का अभिप्राय परिपक्वता तथा कार्यपरक सुधार की वह प्रकिया है , जो संरचना एवं स्वरूप में हो रहे गुणात्मक तथा परिणात्मक परिवर्तनों के फलस्वरूप होती है | विकास अभिवृद्धि की अपेक्षा गुणात्मक परिवर्तन का विशिष्ठ घोतक है | “

ईरा गोर्डन (Era Gordan) : “ व्यक्ति का विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका प्रारंभ जन्म के समय से ही हो जाता है और वह तब तक चलती है , जब तक व्यक्ति पूर्णता को प्राप्त नही कर लेता है | दुसरे शब्दों में विकास व्यक्ति के अधिकतम संगठन और एकीकरण की पूर्णता की प्रक्रिया है |”

वृद्धि का अर्थ ( Meaning of Growth ) :

वृद्धि का अर्थ क्या है ? (what is meaning of growth ?):  हम देखते है की जब मानव का जन्म होता है तो वह एक शिशु के रूप में होता है , अर्थात उसकी लम्बाई ,वजन सब कम होता है | लेकिन जन्म के बाद उसकी लम्बाई , वजन ,आकार बढता है , तथा इसके साथ – साथ शिशु का क्रियात्मक विकास , भाषा विकास और संवेग का विकास भी बढता है |

मनोविज्ञान में वृद्धि और विकास दोनों शब्दों का प्रयोग सामान्यता साथ-साथ होता है , क्यों की दोनों शब्द एक दुसरे के सनिन्कट है लेकिन फिर भी वृद्धि और विकास में बहुत सारे अंतर है जो जिसे हम  वृद्धि और विकास के अर्थ के साथ समझेंगे | 

वृद्धि और विकास में  क्या अंतर है ? |what is difference between growth and development ?| 

वृद्धि का अर्थ हम अगर सीधे तरीके से समझे तो वृद्धि व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन में होने वाले भौतिक और दैहिक (शारीरिक) परिवर्तन है | वृद्धि के अंर्गत होने वाले सभी परिवर्तन मात्रात्मक होते है अर्थात इन्हें हम माप सकते है जैसे गर्भधारण से सामान्यतय: 18 से 20 वर्ष तक की आयु में होने वाले परिवर्तन |

सामान्य सी बात है गर्भधारण के बाद ही शिशु का आकार ,लम्बाई ,और भार में वृद्धि होने लगती है जो शिशु के पोषण और देखभाल पर निर्भर करती है | वृद्धि केवल मानव में ही नही अपितु सभी जीवो और पादपो भी में पाई जाती है |

विकास का अर्थ (meaning of Development):

मानव के विकास का अर्थ हम इस प्रकार समझ सकते है की मानव का विकास समय के साथ उन परिवर्तनों को बताता है जो मात्रात्मक मापन न होकर निश्चित रूप/प्रतिमान (Patterns) के रूप में इंगित होते है ,अर्थात गुणात्मक होते है | जैसे किसी बालक या मानव का सामाजिक विकास (social development) को हम मीटर ,सेंटीमीटर या किलों आदि में नही माप सकते है | लेकिन उसके व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को देख अंदाजा लगा सकते है |

वृद्धि और विकास में कुछ सामान्य अन्तर (General deference between growth and development) :

  1. वृद्धि व्यक्ति के शरीर में होने वाले परिवर्तन है तथा विकास व्यक्ति के सम्पूर्ण रूप में होने वाले परिवर्तन (शारीरिक और मानसिक) है |
  2. वृद्धि व्यक्ति के जीवन में एक निश्चित समय तक होती है , किन्तु विकास व्यक्ति में जीवन पर्यंत चलने वाली प्रगतिशील प्रक्रिया है | अर्थात व्यक्ति का विकास निरंतर होता रहता है |
  3. सार्थक वृद्धि के बिना विकास की पूर्ण कल्पना भी संभव नही है |

हरलॉक (Hurlock) ने विकास में क्रमिकता की बात की है इसके अनुसार विकास के दौरान होने वाले परिवर्तन क्रमबद्ध होते है , अर्थात कोई निश्चित परिवर्तन एक विशेष परिवर्तन के पहले या बाद प्रदर्शित होते है | जैसे हम एक शिशु की गतिक क्रियाओ का उदाहरण ले तो बालक पहले रेंगना सीखता है , खिसकता है ,बैठता और फिर चलना सीखता है | कभी ऐसा नही होता है की बालक पहले चलना सिख जाए और रेंगना बाद में सीखे | ये सिंद्धांत विकास में क्रमिकता का सिद्धांत कहलाया |   

विकास की प्रकृति (Nature of development) :

विकास की प्रक्रिया को समझाने के लिए हमें विकास की प्रकृति को समझना पड़ेगा | विकास की प्रकृति का अर्थ है वे परिवर्तन जो निश्चित सिद्धांत के आधार पर होते है |

  1. विकास एक सतत प्रक्रिया है (Development is continue process ) :
  2. विकास एक व्यक्तिगत प्रक्रिया है (Development is individual process) :
  3. विकास का क्रम सुव्यवस्थित होता है (Development is followed an orderly sequence ) :

मानव विकास को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting human development):

किसी व्यक्ति या बालक का विकास किसी एक तत्व या वस्तु पर निर्भर नही करता है , मानव का विकास को बहुत सारे कारक मिल कर प्रभावित करते है | इन कारको को दो मुख्य भागों में बाँट सकते है

  1. वंशानुक्रम (Heredity)
  2. वातावरण (Environment)

वंशानुक्रम (Heredity) :

प्रत्येक मानव का जन्म उसकी कुछ जन्मजात शक्तियों या गुणों के साथ होता है, ये शक्तियां या गुण उसे उसके माता पिता या पूर्वजो से मिलती है | मानव के डीएनए (DNA) में उपस्थित जीन में उसके पैत्रक गुण होते है जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होते है, ये पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होने वाले गुण ही वंशानुक्रम कहलाते है |

इसको हम एक सामान्य उदाहरण से समझ सकते है जैसे की हम देखते है एक संतान की लम्बाई या चेहरे के गुण उसके माता से मिलते है , इसके साथ-साथ त्वचा का रंग, आँखों का रंग, हाथ पैर, लम्बाई, शारीरिक गुणों के साथ बालक की मानसिक गुण भी पैत्रक रूप में मिलते है जैसे बुद्धि, व्यक्तित्व आदि |

वातावरण (Environment):

मानव या बालक जहा जन्म लेता है और विकसित होता है उस स्थान की भौतिक और सामाजिक पारिस्थिति उसका वातावरण होता है | मानव में जो जन्मजात शक्तिया होती है उसका सम्पूर्ण विकास भी उसके वातावरण पर निर्भर करता है यदि अनुकूल वातावरण ना हो तो उन शक्तियों का विकास अवरुद्ध या रुक जाता है , चाहें वो शारीरिक हो या मानसिक |

वातावरण में भी बहुत से तत्व होते है जो विकास को प्रभावित करते है जैसे :

  1. भोजन
  2. संस्कृति
  3. परिवार
  4. स्वस्थ वातावरण
  5. समाज
  6. पालन पोषण
  7. जीवन चक्र में घटित होने वाली घटनाएँ
मानव वृद्धि और विकास  (human growth and Development ) 

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