March 8, 2021

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बाल विकास के क्षेत्र

बाल विकास के विभिन्न क्षेत्र होते है अर्थात एक बालक के विकास की प्रक्रिया में विभिन्न चरण होते है |उन प्रत्येक चरणों में बाल  विकास अलग -अलग क्षेत्र में होता है जैसे : शारीरिक विकास का क्षेत्र , संवेगात्मक विकास का क्षेत्र , मनोलेंगिक विकास के क्षेत्र, भाषात्मक विकास के क्षेत्र में, मानसिक विकास के क्षेत्र में, नैतिक विकास के क्षेत्र में, सामाजिक विकास के क्षेत्र में, मनोसामाजिक विकास के क्षेत्र में होता है |विकास के ये सारे क्षेत्र बालक की  गर्भाव्यस्ता से प्रारम्भ होकर जीवन पर्यंत तक चलते है |

बाल विकास के क्षेत्र कौन -कौन से है  ?
बाल विकास किन -किन क्षेत्र में होता है  ?
बाल विकास के क्षेत्रो का वर्णन ?

बाल विकास के क्षेत्र

1.शारीरिक विकास
2.सवेगात्मक विकास 
3.मनोलैगिक  विकास
4.भाषात्मक विकास
5.मानसिक विकास
6.नैतिक विकास
7.सामाजिक विकास
8.मनोसामाजिक विकास

 

बाल विकास शारीरिक क्षेत्र में  

(क्रो क्रो) − विकास के अन्य पक्षो को आदान-प्रदान करने का कार्य शारीरिक विकास के द्वारा किया जाता है।

− शारीरिक विकास मे तंत्रिका तत्रं स्नायुमण्डल मांसपेशिया अन्त स्त्रावी ग्रन्थिया आदि सभी को शमिल किया जाता है (अन्त स्त्रावी ग्रंथि  मे एड्रीनलीन पीयुस व थाइराइड ग्रंथि शामिल है।

अन्त स्त्रावी ग्रन्थियो के कार्य –

1 व्यक्ति मे रासायनिक संतुलन बनाए रखना

2 अभिवृति व स्वास्थय को नियंत्रण व प्रभावित करना

3 मानसिक और भावात्मक संतुलन को नियंत्रित व प्रभावित करना

4 चरित्र व नैतिकता को अन्तः स्त्रावि ग्रन्थिया प्रभावित नही करेगी

रूटिगः−जब छोटे बच्चे के गालो को छुआ जाता है तो बालक हँसने के लिए अपना मुँह खोल देता है तथा अपने सिर को सम्बधित व्यक्ति क हाथ की दिशा मे लाने की कोशिश करता है।

भोरोः−जब बालक के सामने किसी वस्तु या खिलोने को रखा जाता है बालक उसे हाथ पैर की क्रियाओ के माध्यम से पकडने की कोशिश करता है।

बोबिन्स्कीः−जब छोटे बच्चे के पैर के तलवे को छुआ जाता है तो बालक अपने हाथ पैर की अंगुलियो को मोडना शुरू कर देता है।

NOTE- शारीरिक अभिवृद्धि की दर पूर्व बचपन मे उतर बचपन की तुलना मे तेज गति से होती है।

1 बीमारी और थकान बालक के शारीरिक विकास को सर्वाधिक प्रभावित करती है।

2 बालक के शारीरिक विकास का मुल्यांकन उसकी कार्यक्षमता के आधार पर किया जाता है।

3 अध्यापक और विधालय बालक के शारीरिक विकास को सबसे कम प्रभावित करते है।

* लम्बाई 

1 जन्म के समय लडका – 20.5 इंच

लडकी – 20.3

2 1 वर्ष की आयु मे लम्बाई  10 इंच तक बढ जाती है।

3 4 वर्ष की आयु मे लडका अपनी कुल लम्बाई के 57% भाग तथा लडकी 60% भाग को प्राप्त करती है।

4 पुर्व किशोरावस्था मे लडकियो की लम्बाई तेज गति से तथा उतर किशोरावस्था मे लडको की लम्बार्इ तेज गति से बढती है।

5 लडकियो की अधिकतम लम्बाई 16 वर्ष की आयु तक और लडको की आयु 18 वर्ष की आयु तक बढती है।

भार/वजनः− जन्म के समय लडके का वजन – 7.15 पौड

(1पौड – 444g या 453gm)  लडकी का वजन – 7.13 पौड

− 6 माह की आयु मे वजन – दुगुना

− 1 वर्ष की आयु मे बालक का वजन अपने जन्म के वजन का तिगुना हो जाता है

− 4 वर्ष मे वजन – 38 पौडं

− 5 वर्ष मे वजन – 43 पौडं

− 6 वर्ष मे वजन – 50 पौडं

− पुर्व किशोरावथा मे लडकियो को वजन तेज गति से और उतर किशोरवस्था मे लडको का वजन तेज गति से बढता है।

हडिडयाः− कैल्सियम और फास्फोरस (फास्फेट) से मिलकर बनी है।

1 भुग्रावस्था मे हड्डियो की संख्या 306

2 जन्म के समय शिशु मे 270 हड्डिया पार्इ जाती है। जो नरम मूलायम और लचीली होती है।

3 नरम मूलायम और लचीली होती है।

4 बाल्यवस्या मे 350 हड्डिया होती है।

5 किशोरावस्था मे 206 हड्डिया होती है।

अर्थात किशोरावस्था व उसके बाद मानव शरीर मे हड्डियो की सख्या कम होना शुरू हो जाती है।

दाँतः− शरीर का सबसे कठोर अंग/भाग है।

1.अस्थायी दांत – इन्हे दुध के दाँत व प्राथमिक दाँत भी कहते है।

संख्या – 20 (Reet 2016)

2.स्थायी दाँत  – दितीय दाँत भी कहते है।

संख्या – 32

− 6 माह की आयु मे अस्थाई  दाँत निकलना शुरू

− 1 वर्ष की आयु मे 8 दाँत निकल जाते है।

− 4 वर्ष की आयु मे सभी दुध के दाँत निकल जाते है।

− 6 वर्ष की आयु मे दुध के दाँत निकल जाते है।

− 12-13 वर्ष की आयु मे स्थायी दाँत निकल जाते है।

− व्यक्ति के मुँह मे निकलने वाला अन्तिम दाँतो प्रज्ञा दन्त(अक्ल जाड) कहलाता है।

मस्तिक जब शिशु गर्भावस्था मे 3 सप्ताह का होता है तो मस्तिस्क का निर्माण शुरू हो जाता है।

− जब शिशु गार्भावस्था मे 3 माह का होता है तो मस्तिस्क का निर्माण शुरू हो जाता है।

− जन्म के समय मस्तिस्क का वजन 350gm होता है। और लम्बार्इ शरीरि की कुल लम्बार्इ का ¼ हिस्सा होती है।

− 3 वर्ष की आयु मे मस्तिस्क का आधे से अधिक विकास हो जाता है। और वजन 1260gm हो जाता है।

− 5 वर्ष की आयु मे मस्तिस्क 10%विकास हो जाता है।

− 16 वर्ष की आयु मे मस्तिस्क का पुर्ण विकास हो जाता है और वजन 1400gm हो जाता है।

डोपामिनः− यह मस्तिस्क का मित्र हार्मोन है जो मस्तिस्क की कार्यक्षमता को बढा देता है।

ह्रदय/धडकनः− जब शिशु गार्भावस्था मे 4 सप्ताह का होता है तो ह्रदय धडकन शुरू हो जाता है तथा जीवन पर्यन्त धडकता है अन्तः ह्रदय को शरीर का सबसे व्यस्त अंग माना जाता है।

गर्भावस्था – 1 मिनट मे 160 बार

1 माह    − 140/मिनट

6 वर्ष    − 100/मिनट

12 वर्ष   − 85/मिनट

16 वर्ष   − 72/मिनट

मांसपेशियाः− जब शिशु गर्भावस्था मे 3 सप्ताह का होता है तो मांसपेशियो का निर्माण शुरू हो जाता है।

− जन्म के समय मांसपेशियो का वजन कुल वजन का 23% होता है।

− 9 वर्ष की आयु मे 27% (कुल वजन का)

− 12 वर्ष की आयु मे 33%(कुल वजन का)

− किशोरावस्था /16 वर्ष मे 44.5 (कुल वजन का)

माँसपेशियो की सख्या – 639

 बाल विकास सवेगात्मक क्षेत्र में  

संवेग शब्द अग्रेजी भाषा के इमोशन शब्द मे बना है

− अग्रेजी भाषा का इमोशन शब्द लैटिन भाषा के इमोवर शब्द से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है – उतेजित करना / हलचल करना

वुडवर्यः – व्यक्तिकी उतेजित दशा ही संवेग कहलाती है।

पाँवलाव− संवेग सभी विकास की रीढ है।

मैक्डुगल – संवेग प्रकृति का ह्रदय है।

क्रो व क्रो – सामाजिक विकास और संवेगात्मक विकास दोनो साथ साथ चलते है।

अरस्तु – क्रोध करना आसान कार्य है लेकिन सही समय पर सही यात्रा मे सही व्यक्ति से सही क्रोध करना आसान कार्य नही है।

     − एड्रिनल ग्रन्थि को प्रत्यक्ष रूप से संवेगो के साथ जोडा जाता है।

     − संवेगो का नियत्रण व संचालन प्रमस्तिस्क के द्धरा किया जाता है।

     − संवेगो का नियंत्रण हाइपोथेलेमस के द्धवरा किया जाता है।

     − संवेगो का अध्ययन सवेगात्मक बुद्धि द्धरा किया जाता है। जिसका प्रतिपादक डेनियल गोलमेन है।

     − संवेगो का अध्ययन करने वाला और संवेगो पर लिखने वाला प्रथम मर्नोवेज्ञानिक – वाटसन

  वाटसन – ने नवजात शिशु मे 3 संवेग बताये है जिन्हे वह जन्मजात और प्राकृतिक संवेग मानता है।

     भय – बालक मे अनुशासन हीनता का मूल कारण भय है।

   NOTE− मैक्डुगल ने जीवन का सबसे प्रभावशाली संवेग भय को माना है।

क्रोध – बालक मे सवेगात्मक संघर्ष का मूल कारण क्रोध है।

स्नेह

NOTE− ब्रिजेज का मानना है कि जन्म के समय शिशु मे कोई  भी संवेग नही पाया जाता शिशु मे तो केवल उतेजना पाई  जाती है। जिसका प्रदर्शन जन्म के 2 सप्ताह बाद किया जाता है।

ब्रिजेज का मानना है कि 3 माह मे बालक मे 2 संवेग पैदा हो जाते है।

  • दुःख 2 आनन्द

− दुख से 4 संवेगो की उत्पति होती है

भय  2 क्रोध  3 घृणा  4 र्इष्या

    − आनन्द से 3 संवेगो की उत्पति होती है।

उल्लास   2 प्रेम   3 हर्ष

NOTE− ब्रिजेज का मानना है कि सबसे अंत मे हर्ष संवेग की उत्पति होती है। (2 वर्ष या 24 माह)

मूल प्रवृतियो का प्रतिपादक – मैक्डुगल

− मैक्डुगल का मानना है कि मुल प्रवृति सभी प्राणियो मे पाई  जाती है।

− मैक्डुगल ने व्यक्ति मे 14 संवेग व 14 मुल प्रवृति बतायी जाती है।

− गिलर्फोड ने व्यक्ति मे 14 संवेग और 14 मुल प्रवृतिया बताई ।

− व्युचिक ने व्यक्ति मे 8 संवेग बताये है।

− सिगमण्ड फ्रायड ने व्यक्ति मे 2 मुल प्रवृतिया बतायी है।

− बरोन का मानना है कि व्यक्ति मे असख्य मुल प्रवृति और असंख्यक ही संवेग पाये जाते है अर्थात 1 लाख से अधिक मुल प्रवृति व 1 लाख से अधिक संवेग

−     मुल प्रवृति                      संवेग

1    पलायन                         भय

2    युयुत्सा                         क्रोध

3    निवृति                          घृणा

4    शिशु कामना                  वात्सल्य

5    संवेदना                         कष्ट

6    जिज्ञासा                        आश्चर्य

7    आत्महीनता                     अधिनता

8    आत्मप्रदर्शन                    श्रेष्ठता

9   भोजन की खोज                  भूख

10  संचय                           अधिकार

11 सामुहिकता                        एंकाकीपन

12 काम प्रवृति                        कामुकता

13 सृजनात्मकता                      रचनात्मकता

14 हास्य                             आमोद

   संवेगो की विशेषता –

  • संवग जन्म जात और प्राकृतिक होते है।
  • संवेग सर्वभौतिक होते है।
  • संवेगो के द्धारा ही मूल प्रवृतियो को अभिव्यक्त किया जाता है।
  • संवेगो की उत्पती आंतरिक स्तर पर होती है और उन्हे बाहरी शारीरिक पक्ष द्धारा अभिव्यक्त किया जाता है।
  • संवेगो के दो पक्ष होते है।
    1. सकारात्मक संवेग – वात्सलय, स्नेह, सहयोग आदि
    2. नकारात्मक संवेग – घृणा, र्इर्ष्या, द्धेष
  • बालक को संवेगात्मक नियंत्रण के लिए आत्मानुभूति का ज्ञान देता चाहिए।
  • संवेग के तत्व – दैनिक, व्यावहारिक, संज्ञानात्मक
  • वंशानुक्रम, वातावरण, अधिगम, प्रशिक्षण, सामाजिक सास्कृतिक परिवर्तन आदि सभी संवेगो को प्रभावित करते। है।
  • संवेगो की अभिव्यक्ति काँहा से प्रारभ− जन्म से
  • किस अवस्था मे संवेगात्मक व्यवहार सर्वधिक अस्पष्ट व अस्थिर होते है।– शैशवस्था
  • किस अवस्था मे संवेगात्मक व्यवहार सर्वाधिक तरिवर्तन होते है।– बाल्यवस्था मे

बाल विकास मनोलेंगिक क्षेत्र में

          प्रतिपादक – सिगमण्ड फ्रायड

सिगमण्ड फ्रायड की विचार धारा – मनोविश्लेषण वाद

मनोविश्लेषण वाद विचार धारा के दो भागो मे बाँटा

  • व्यक्तिक मनोविज्ञान – जनक –एडलर
  • विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान – जनक – युग / जुंग

          − सिगमण्ड फ्राण्ड ने मनोलैगिंक विकास को 5 अवस्थाओ मे बांटा है।

1. मुख प्रधान – समयः जन्म से 1 ½  – 2 वर्ष

− इस अवस्था मे बालक के ध्यान को केन्द्र बिन्दु उसका मुख होता है और बालक चुसना काटना व निगलना जैसी क्रियाए करना सीख जाता है।

− इस अवस्था मे बालक के कार्य और व्यवहार मूल म्रवृति आधारित होते है।

− बालक मे लिबिडो ग्रन्थि का विकास शुरू हो जाता है जिसे लैगिक ऊर्जा 1 यौन ऊर्जा के साथ जोडा जाता है।

− फ्रायड का मानना है की लिबिडो ग्रन्थि के कारण की काम प्रवृति की भावना पार्इ जाती है।

2. गुदा प्रधान अवस्था –

समय 1 ½ – 2 वर्ष से 3-4 वर्ष

− इस अवस्था मे बालक का व्यवहार क्रोधी, जिददी, चिडचिडा, स्वार्थी

− इसे दो भागो मे बाटा गया है ।

  • गुदा धारण अवस्था – इस अवस्था मे बालक मल−मुत्र के बारे मे नही बताता है और मलमुत्र को रोकने की कोशिश करता है।
  • गुदा निष्कासन अवस्था – इस अवस्था मे बालक मल−मुत्र मे बारे मे बताना शुरू कर देता है और स्वेच्क्षा से मलमुत्र का त्याग करना शुरू कर देता है।

3. लिंग प्रधान अवस्था – समयः 4 से 6 वर्ष

इस अवस्था मे लडके मे ओडिप्स ग्रन्थि और लडकी मे इलेकट्रा ग्रन्थि का निर्माण शुरू हो जाता है।

− इन ग्रन्थियो का प्रमुख कार्य विपरित लिंग के प्रति आकर्षण को पैदा करना है।

− ओडिपस ग्रन्थि के कारण लडका अपनी माता से अधिक प्रेम करता है।

           − इलेक्ट्रा ग्रन्थि के कारण लडकी अपने पिता से अधिक प्रेम करती है।

4. अव्यक्त अवस्थाः

समय 6 से 12 वर्ष

− इस अवस्था के अन्तिम चरण मे शारीरिक परिवर्तन तेज गति से होते है जिन्हे बालक अपने से बडे लोगो के सामने अपने विचारो मे शारीरिक परिवर्तन तेज गति से होते है जिन्हे बालक अपने से बडे लोगो के सामने अपने विचारो मे अभिव्यक्त नही कर पाता है अतः इसे अव्यक्त अवस्था कहा जाता है।

− इस अवस्था मे काम प्रवृति की भावना मे कमी आ जाती है और बालक मे सामाजिक सहयोग नैतिकता आदि सभी सदगुणो का विकास शुरू हो जाता है।

5. जननात्मक अवस्था

समय 12 वर्ष के बाद

− इस अवस्था मे बालक मे लिबिडो ग्रन्थि ओडिप्स ग्रंन्थि इलैक्ट्रा ग्रंन्थि और यौन अंगो का पुर्व विकास हो जाता है तथा प्रजनन क्षमता भी विकासित हो जाती है।

बाल विकास भाषात्मक क्षेत्र में

 

− प्रतिपादक – चौमस्की

− जन्म के समय शिशु को किसी भी भाषा का ज्ञान नही होता है।

− भाषा विकास के सम्बंध मे की जाने वाली पहली क्रिया− रोना / क्रदंन / बबलाना है और दुसरी क्रिया शब्द भंडार है।

− भाषा विकास मे बालक के द्धारा पहले स्वर और बाद मे व्यंजन को सीखा जाता है।

− लगभग 2 माह की आयु मे बालक सभी स्वरो और 4 माह की आयु मे बालक सभी व्यंजनो की ध्वनि निकालना शुरू कर देता है1

चौमस्की – बालक लेंग्वेज एग्जीविशन डिवाईस  के रूप  मे पैदा होता है।

− भाषा सीखने का सहायक माध्यम – ज्ञानैन्द्रिया / इन्द्रिया

− भाषा सीखने का सहायक तत्व – अनुकरण

− स्कीनर ने भाषा सीखने का सहायक तत्व – अनुकरण व पुनर्बलन

− वाइगोस्टकी ने भाषा सीखने का सहायक तत्व – सामाजिकर्,सांस्कृतिक,निर्मितवा

*भाषा की विशेषता*

1 भाषा एक अर्जित साधन है।

2 भाषा का सर्वप्रथम प्रयोग विचार अभिव्यक्ति के लिए किया जाता है।

3 भाषा हमारी विचार प्रकिया को प्रभावित करती है।

4 बालक को सबसे पहले भाषा मे संज्ञा का ज्ञान दिया जाता है।

5 भाषा का विकास सरल से जटील ज्ञात से अन्त्त संश्लेषण से विश्लेषण की ओर होता है।

6 मनोविज्ञान मे भाषा की सबसे छोटी र्इकार्इ स्वनिम को माना जाता है – थ प च फ

7 भाषा को सीखने के लिए अक्षरो और शब्दो के मध्य साहचर्य को स्वापिस किया जाना चाहिए।

8 3-4 वर्ष की आयु मे बालक अपनी मातृभाषा को सीख जाता है।

9 3-4 वर्ष की आयु मे बालक की भाषा आत्मकेन्द्रित होती है अर्थात बालक अपनी आवश्यकताओ को पुरा (भोजन, पानी, खिलौना)  करने के लिए भाषा को काम मे लेना है।

10 भाषा सीखने का सही क्रम – L-S-R-W

सुनना – बोलना – पढना – लिखना

भाषा सीखने का सबसे जटील क्रम – लिखना

11 लगभग 10 माह की आयु मे बालक सार्थक(6-10 माह) शाब्द का प्रयोग करना शुरू कर देता है।

  • अध्यापक एक बहुभाषी कक्षा को संसाधन के रूप मे देखता है।
  • भाषा सीखने की सबसे संवेदनशील अवस्था – प्रारम्भिक / पूर्व बाल्यवस्था को माना जाता है।
  • स्मिथ का मानना है कि लगभग 5 वर्ष की आयु मे बालक का शब्द भंडार 2072 हो जाता है।

बाल विकास मानसिक क्षेत्र में

      अरस्तु – स्वास्थय शरीर मे स्वस्थ मस्तिस्क का निवास होता है ।

      सोरेन्सनः− जैसे जैसे बालक प्रतिदिन प्रतिमाह और प्रतिवर्ष बढता है वैसे वैसे बालक की मानसिक शक्तियो मे परिवर्तन होता है|

      गसेल− प्रारम्भिक 6 वर्षो मे बाद के 12 वर्षो की तुलना मे दुगुना मानसिक विकास हो जाता है।

      क्रो व क्रो −  लगभग 6 वर्ष की आयु मे बालक का मानसिक विकास पूर्णतया को प्राप्त कर लेता है।

      प्रिन्टर  − जन्म से लेकर 16 वर्ष की आयु तक बुद्धि का पुर्ण विकास हो जाता है।

      वाटसनः− 15 से 20 वर्ष की आयु मे मानसिक विकास पुर्णतया को प्राप्त कर लेता है|

 निष्कर्ष – 16 वर्ष की आयु मे मानसिक विकास पुर्णतया को प्राप्त कर लेता है।

मानसिक विकास के पक्षः−

    1 संवेदनाः− अनुभव /महसुस करना

जीवन का प्रथम और सबसे सुम्वद अनुभव संवेदना को माना जाता है।

सवेदंना ज्ञान की प्रथम सीढी है। इस कथन को मानसिक विकास के साथ जोडा जाता है।

2 स्मृतिः− याद रखना

वुडवर्थ – किसी सीखी हुई  वस्तु का सीधा उपयोग ही स्मृति है।

स्मृति के तत्व – 1 पहचान

2 धारण

3 पुनःस्मरण

− संघनन के सिहांत को स्मृति के साथ जोडा जाता है।

3 अवधानः− ध्यान को केन्दित करना

J.S. रास – किसी दुसरी वस्तु विषय वस्तु की तुलना मे एक ही विषय वस्तु पर चेतना का केन्द्रिकरण अवधान कहलाता है।

अवधान के आंतरिक तत्व – रूचि, लक्ष्य, अभिवृति

अवधान से संवेधिन विकार – ADHD

             A−अटेन्सन          D−डिफेक्ट

     H –हार्इपर एक्टीवटी    D−डिस आर्डर

4 अभिवृतिः− नजरीया/सोचने की क्षमता /द्रष्टिकोण

अभिवृति मे ज्ञानात्मक, भावात्मक,क्रियात्मक सभी पक्षो को शामिल किया जाता है।

− अभिवृति का सर्वप्रथम मापन 1927 मे थस्टर्न ने किया

युग्म तुलनात्मक विधि से

  • चिंतन 6 समस्या सामाधान     7 कल्पना      8 समायोजन   9 बुद्धि   10 अधिगम   11 भाषा
मानसिक विकास के पहलुः−

1 ज्ञान के भंडार मे वृद्धि करना

2 ज्ञान का वास्तविक जीवन मे उपयोग

मानसिक विकास मे बालक के द्धरा की जाने वाली गतिविधिया व क्रियाकलापः−

− 1 सप्ताह के बालक के कार्य और व्यवहार मुल प्रवति आधारित होते है।

− 2 सप्ताह का बालक चमकीली वस्तु बडी वस्तु और प्रकास को देखकर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करता है।

−1 माह का बालक भुख और कष्ट का अनुभव करके रोना शुरू कर देता है।

− 2 माह का बालक आवाज को सुनकर अवाज की दिशा मे सिर घुमाने की कोशिश करता है।

− 3 माह का बालक अपनी मा को पहचानना शुरू कर देता है ।

− 6 माह मे बालक अपना नाम पहचानना शुरू कर देता है। प्रेम तथा क्रोध मे अंतर करना सीख जाता है।

− 1 वर्ष का बालक अन्य लोगो के कार्य और व्यवहार का अनुकरण करना शुरू कर देता है।

− 2/1 -3 वर्ष की आयु मे बालक मे सोच विचार की क्षमता शुरू हो जाती है।

− 3 वर्ष का बालक अपना नाम बताना शुरू कर देता है तथा सामने खीची सीधी व टेढी रेखाओ के समान रेखा खीचने की कोशिश करता है।

− 4 से 5 वर्ष की आयु मे बालक वर्ण, अक्षर,शब्द आदि सभी को लिखना शुरू कर देता है।

− 5 वर्ष का बालक विभिन्न रंगो के नाम सीख जाता है। तथा विभिन्न रंगो मे अंतर करना व उन्हे पहचानना शुरू कर देता है।

− 6 वर्ष का बालक विभिन्न अंगो के नाम बताना शुरू कर देता है।

− 7 वर्ष का बालक छोटी छोटी घटनाओ को याद रखना शुरू कर देता है।

− 8 वर्ष का बालक सुनी हुर्इ कहानीयो और कविताओ को अन्य लोगो या परिवार के सदस्यो को सुनाने की कोशिश करता है।

− 9 वर्ष के बालक को दिन समय वार वर्ष घटना और सिक्को का ज्ञान हो जाता है।

तथा बालक देखी हुर्इ और सुनी हुर्इ विषय वस्तु का 60% याद रखता है।

−10 वर्ष का बालक सामाजिक परम्परा प्रथा रीति रिवाज सभयता मेले त्यौहार उत्सव आदि सभी मे भाग लेने और रूचि लेना शुरू कर देता है।

− 11 वर्ष मे बालक मे तर्क जिज्ञासा और निरक्षण शक्ति का विकास हो जाता है।

− 12 वर्ष के बालक मे समस्या समाधान क्षमता पैदा हो जाती है और बालक देखी हुर्इ व सुनी हुर्इ विषय वस्तु का 75% हिस्सा याद रखता है।

− 16 वर्ष की आयु मे बालक का मानसिक विकास पूर्णत्या को प्राप्त कर लेता है।

बाल विकास नैतिक क्षेत्र में

 नैतिक विकास प्रतिपादक – कौहलबर्ग

नैतिक विकास से तात्पर्य बालक को अपेक्षित व्यवहार से परिचित करवाना अर्थात बालक को समाजिक परम्परा, प्रथा, रिवाज, नियम, कानुन, आदि सभी से परिचित करवाना ही बालक का नैतिक विकास है।

− कोहलबर्ग का मानना है की बालक के नैतिक विकास को प्रभावित करने का कार्य सामाजिक विकास, सांस्कृतिक विकास, मित्र मण्मडली और काम प्रवृति की भावना के द्धारा किया जाता है।

− बालक मे नैतिकता का विकास करने के लिए दमन के स्थान पर शोधन को महत्व देना चाहिए।

कोहलबर्ग पर जीन त्याजे का प्रभाव पडा है।

जीन प्याजे ने नैतिक विकास की 2 अवस्था बताई  है।

1 . परायत नैतिकता की अवस्था – 2 से 8 वर्ष

 2 . स्वायम नैतिकता की अवस्था – 9 से 11 वर्ष

कोहलबर्ग और जीन त्याजे ने नैतिक विकास करने के लिए प्रतिपादन करने के लिए साक्षात्कार विधि को काम मे लिया ।

− कोहलबर्ग ने अपना प्रयोग 10 से 16 वर्ष के बालको पर किया जिन्हे हिज नामक व्यक्ति की कहानी सुनाई ।

− कोहलबर्ग का नैतिक विकास नैतिक तकंणा और कार्यवाही के बीच स्पष्ट सम्बंध स्थापित करना।

− कोहलबर्ग ने अपने नैतिक विकास की 3 सार और 6 अवस्थाए बताई  है।

1 . प्री−कनवेशनल सारः

समय 4 से 10 वर्ष

− इसे पूर्व लौगिक स्तर कहा जाता है।

− इस स्तर मे नैतिकता का आभाव पाया जाता है।

− इस स्तर बालक की नैतिकता अन्य लोगो द्धारा निर्धारित कि जाता है अर्थात बालक अपने से बडे लोगो द्धारा बनाए गये नैतिक नियमो को स्वीकार करता है और पालन करता है।

− इस स्तर मे बालक नैतिकता लेते समय अर्न्तनिहित दण्ड की ओर अग्रसित होता है।

− कोहलबर्ग का मानना है की 9 वर्ष के बालक की नैतिक तर्कणा इस बात पर आधारित होति है कि किसी भी भौतिक वस्तु के परिणाम अच्छे है या बुरे।

अर्थात इस स्तर मे बाहरी पुरस्कार और दण्ड को महत्व दिया जाता है।

− इस स्थर को दो भागो मे बाँटा गया है।

(अ). दण्ड और आज्ञाकारिता उन्मुख अवस्था −

बालक दण्ड से बचना चाहता है इसी कारण बालक अपने से बडे लोगो की आज्ञा का पालन करता है।

(ब). साधानात्मक सापेक्ष वादी उन्मुख अवस्था –

इस अवस्था मे बालक पुरूसकार को प्राप्त करने की कोशिश करता है।

− कोहलबर्ग के अनुसार प्राथमिक कक्षा का बालक दण्ड ओर आज्ञाकारिता तथा व्यक्तिगत विनिमय का अनुसरण करता है।

− यदि अध्यापक बालक मे नैतिकता को विकसित करना चाहता है तो वह बालक को नैतिकता आधारित चर्चाओ मे शामिल करे।

2.  कनवेशनल सारः−

समय 10 से 13 वर्ष

इसे परम्परागत स्तर रूढिवादी स्तर और लौकिक स्तर भी कहा जाता है इसमे बालक तर्क विर्तक और वाद विवाद के आधार पर सही गलत का निर्माण लेना है और जो नैतिकता के नियम सही होते है उन्हे स्वीकार करता है।

इस तर्क को दो अवस्थाओ मे बाटा गया है।

उतम बालक – अच्छी लडकी उन्मुख अवस्था

इस अवस्था मे बालक अनुमोदन को प्रात करना चाहता है और निरअनुमोदन से दुरू रहना चाहता है अर्थात बालक यह सोचना शुरू कर देता है कि अच्छे कार्य वही है जो दूसरे के द्धारा स्वीकृत व मान्य है।

जैसे – 1 आप यह मेरे लिए करे वह मे आपके लिए करूंगा।

2 यदि आप र्इमानदार है तो आपके माता – पिता आप पर गर्व करेगें। अतः आप हमेशा र्इमानदार बने रहे।

सामाजिक अवस्था को बनाये रखने की उन्मुख अवस्थाः−

इस अवस्था मे बालक के द्धारा नैतिक नियमो पर आधारित वही कार्य और व्यवहार किया जायेगा जो परिवार समाज और देश के हित मे हो

3. पोस्ट कनवेशनल स्तरः−

समय 13 वर्ष के बाद

− इसे पश्च परम्परागत अवस्था, पश्च रूढिवादी स्थर और पश्च लौकिक स्थर भी कहा जाता है।

− यह नैतिक विकास का सबसे उच्च स्थर है।

− इस स्तर मे नैतिक नियम व निर्णय व निर्णय स्वयंम के आंतरिक नियत्रण मे होते है।

इसे दो अवस्थाओ मे बांटा गया है।

  अ )− सार्वभौतिक नीति परक उन्मुख अवस्थाः−

    इस अवस्था मे व्यक्ति अपने नैतिकता के नियम बना लेता है और व्यक्ति यह सोचता है कि वह स्वयंम और उसके परिचित लोग उसी के द्धारा बनाये गये नैतिक नियमो को स्वीकार करता है। क

इस अवस्था मे व्यक्ति आत्मनिदां से बचना चाहता है।

ब )सामाजिक अनुबंध उन्मुख अवस्था

   इस अवस्था मे व्यक्ति यह सोचना शुरू कर देता है कि समाज का नैतिक विकास तभी सम्भव है जब समाज के सभी व्यक्ति निर्धारित किए गये नैतिक नियमो का पालन करे।

− व्यक्ति यह सोचना शुरू कर देता है कि कानुन कभी भी स्थायी नही होते है उन्हे देश हित मे बदला जा सकता है।

− कोहलबर्ग की नैतिक विकास की आलोचनाः−

   − कोहलबर्ग ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन पाश्चात्य संस्कृति की अवधारणा के आधार पर किया है।

− कोहलबर्ग ने अपने नैतिक अध्ययन को मुलताः पुरूषो के नमुने पर आधारित किया है।

− अपने सिद्धांत मे लैगिंक पूर्वाग्रह को (महिला की तुलना मे पुरूष को अधिक महत्व देना ) महत्व दिया है।

− कोहलबर्ग का मानना है कि जैसे जैसे व्यक्ति कि आयु बढगी व्यक्ति मे स्वतः ही नैतिक विकास होगा लेकिन वास्तविक व्यवहार मे एसा नही है।

− कोहलबर्ग का नैतिक विकास सीमित है क्योकि कोहलबर्ग ने एक कहानी (दुविधा) के माध्यम से नैतिक विकास का प्रतिपादन किया है।     

 

 

बाल विकास सामाजिक क्षेत्र में

अरस्तु – मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जो समाज में रहता है जो मनुष्य यह कहे कि उसे समाज की आवश्यकता नहीं है तो वह या तो देवता है या फिर पशु |

क्रो व क्रो –जन्म के समय शिशु ना तो सामाजिक होता है और ना ही असामाजिक लेकिन वह बहुत अधिक समय तक इस स्थिति में नहीं रह पाता |

जे एस रॉस – समाज के द्वारा स्वीकृत कार्य और व्यवहार को स्वीकार करना ही सामाजिक विकास है |

सामाजिक विकास के अभिकरण :

अ ) प्राथमिक अभिकरण = परिवार , पडोसी , रक्त सम्बन्ध पर आधारित रिश्तेदार , |

ब )द्वितीयक अभिकरण = विधालय ,खेल का मैदान , पुस्कालय , इक्को क्लब , संचार के साधन , सामाजिक व धार्मिक संस्थाए , रीती रिवाज , परम्परा -प्रथा आदि सभी |

-सामाजिक विज्ञान की सबसे क्रियाशील एजेंसी परिवार|

-समाज विकास की सबसे निष्क्रिय एजेंसी सार्वजनिक पुस्तकालय |

-बाल्यावस्था मैं बालक में सामाजिकता की भावना का विकास शुरू हो जाता है |

-किशोरावस्था में बालक अपने सामाजिक व्यवहार की मान्यता व स्वीकृति चाहता है |

सामाजिक विकास की विशेषता
  1. सामाजिक विकास का संबंध बालक में सामाजिकरण की प्रक्रिया से है |
  2. सामाजिक विकास एक अधिगम की प्रक्रिया है |
  3. सामाजिक विकास एक समायोजन की प्रक्रिया है |
  4. सामाजिक विकास समाज में सदगुणों को विकसित करता है |
  5. सामाजिक विकास के आधार पर ही व्यक्ति और पशु में अंतर किया जाता है |
  6. सामाजिक विकास ही मनुष्य को जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी बनता है |
  7. सामाजिक विकास के आधार पर समाज में लोगो के दो व्यवहार (सकारात्मक और नकारात्मक व्यव्हार) होते है |

 

बाल विकास मनोसामाजिक क्षेत्र में

 

प्रतिपादक एरिकसन

अन्य नामपहचान का विकास सिद्धांत /अस्मिता का सिद्धांत

-एरिकसन ने अपने सिद्धांत में यह स्पष्ट किया कि यह व्यक्ति किस प्रकार समाज में मान सम्मान को प्राप्त करता है और किस प्रकार से बनाए रखता है |

-एरिकसन अपने सिद्धांत की अवस्थाएं बनाई है जिसमें वह जन्म से लेकर जीवन पर्यंत को शामिल करता है |

-एरिकसन का मानना है कि प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति दो प्रकार के विचार पाया जाता है |

अवस्थाविचार  समय
शैशवावस्थाविश्वास /अविश्वासजन्म से 1 वर्ष
प्रारंभिक बाल्यावस्थास्वतंत्रता /लज्जा शीलताएक से 3 वर्ष
खेल की अवस्थापहल शक्ति /दोषिता 3 से 5 वर्ष
विधालय की अवस्थापरिश्रम /हीनता6 से 12 वर्ष
किशोरावस्थाअहम् /पहचान/भूमिका/भ्रान्ति12 से 18 वर्ष
तरुण व्यस्कावस्थाघनिष्ठा / विलगनता20 से 30 वर्ष
मध्य व्यस्कावस्था जन्मत्मकता /स्थिरता40 से 50 वर्ष
परिपक्वस्थाअहम् पूर्णता / निराशा60 से जीवनपर्यन्त
बाल विकास के क्षेत्र
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